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हेल्थ के लिए खतरनाक है ग्लूटन, जानें नुकसान से लेकर बचाव तक सबकुछ

क्या आप जानते हैं कि ग्लूटन आपकी सेहत के लिए खतरनाक है? क्या आप जानते हैं कि ग्लूटन होता क्या है और यह क्यों खतरनाक है? आइए जानते हैं इसके बारे में सबकुछ:

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सीलिएक बीमारी, वीट इंटॉलरंस और ग्लूटन की बातें अब अपने देश के लोगों को भी कुछ परेशान करने लगी हैं। कुछ हद तक भ्रम की स्थिति बनी हुई है कि गेहूं अचानक दुश्मन कैसे हो गया? इस विषय पर देसी और विदेशी एक्सपर्ट्स से बात कर पूरी जानकारी दे रहे हैं लोकेश के. भारती:

क्या आप जानते हैं कि ग्लूटन आपकी सेहत के लिए खतरनाक है? क्या आप जानते हैं कि ग्लूटन होता क्या है और यह क्यों खतरनाक है? दरअसल ग्लूटन गेहूं, जौ और जई (बार्ली) जैसे अनाजों में मिलने वाला एक प्रोटीन है। ग्लूटन में कई तरह के तत्व होते हैं। उनमें से एक है ग्लियाडिन (Gliadin)। ग्लूटन इसी ग्लियाडिन की वजह से खतरनाक बनता है यह सीलिएक और ग्लूटन से एलर्जी रखने वालों के लिए हानिकारक है। जब कोई ग्लूटन सेंसिटिव शख्स ग्लूटन प्रॉडक्ट खाता है तो शरीर ग्लूटन को अपना दुश्मन समझने लगता है। असल परेशानी यही से शुरू होती है। इसकी वजह से शरीर में कई तरह की समस्याएं पैदा होने लगती हैं।

ग्लूटन संबंधी समस्या कितने तरह की?
1. सीलिएक ग्लूटन सेंसिटिव
2. नॉन-सीलिएक ग्लूटन सेंसिटिव या वीट इंटॉलरंस

सीलिएक

क्या और क्यों?
कुछ लोग बचपन से ही ग्लूटन को लेकर सामान्य नहीं होते। जिन्हें सीलिएक बीमारी होती है, उनमें ग्लूटन प्रोटीन पूरी तरह से पच नहीं पाता और इससे छोटी आंत की म्यूकोसा लेयर को नुकसान पहुंचता है। इससे उसमें छोटे-छोटे सुराख हो जाते हैं। इस वजह से खाना पचता नहीं है और कई दूसरी तरह की समस्याएं भी हो जाती हैं। यह जन्मजात होती है।

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ग्लूटन संबंधी समस्या 2 तरह की है।

लक्षण
इसके पेशंट की लंबाई कम होती है, वजन नहीं बढ़ पाता। उनमें डायरिया, एनीमिया और हड्डियों की कमजोरी जैसे लक्षण हो सकते हैं।
नोट: यहां एक बात का ध्यान रखना जरूरी है कि इस तरह के लक्षण दूसरी बीमारियों के भी हो सकते हैं, इसलिए स्पेशलिस्ट डॉक्टर को दिखाने और टेस्ट कराने के बाद ही किसी नतीजे पर पहुंचा जा सकता है।

नॉन-सीलिएक

नॉन-सीलिएक ग्लूटन सेंसिटिव या वीट इंटॉलरंस एक ऐसी समस्या है जिसके लक्षण तो सीलिएक जैसे होते हैं, लेकिन यह उससे अलग है। यह जेनेटिकल (खानदानी) नहीं है और न ही उतनी गंभीर बीमारी है। फूड हैबिट्स की वजह से इसका जन्म होता है। गेहूं, जौ आदि के ज्यादा सेवन और दूसरे अनाजों को नजरअंदाज करने से कुछ लोगों को पेट में अक्सर दर्द, पेट फूलने जैसी समस्याएं होती रहती हैं। डॉक्टर की सलाह से जब कोई शख्स ग्लूटन वाली चीजें खाना बंद करता है तो अमूमन धीरे-धीरे यह समस्या दूर हो जाती है।

ग्लूटन से हो सकती हैं ये समस्याएं:
मुंह: अल्सर, गले में खराश
दिमाग: माइग्रेन, थकान, सिर में दर्द, डिप्रेशन, भूलने की आदत
पेट: अपच, गैस, कब्ज, पेट दर्द
छोटी आंत: सीलिएक बीमारी, डायरिया
बड़ी आंत: डायरिया, कब्ज, मलद्वार का फूल जाना
स्किन: एग्जीमा, डर्मटाइटिस
ग्रोथ: लंबाई और वजन का कम रहना
इम्यून: इम्यून सिस्टम कमजोर, बार-बार इंफेक्शन होना

चूंकि प्रभावित व्यक्ति का पाचन तंत्र ठीक से काम नहीं करता है इसलिए उन्हें ये समस्याएं भी हो सकती हैं:
हड्डी और जॉइंट का रोग ओस्टियोपोरोसिस, जॉइंट पेन, अनीमिया, शरीर में विटामिन और मिनरल्स की कमी व नपुंसकता।

नोट: यहां इस बात को जरूर ध्यान में रखें कि शरीर के ऊपर लिखे अंग दूसरी बीमारियों की वजह से भी प्रभावित हो सकते हैं, वहीं ऊपर लिखे लक्षण दूसरी बीमारियों के भी हो सकते हैं। इसलिए डॉक्टर से जांच करवाना जरूरी है।

क्या सीलिएक बीमारी जीन से जुड़ी है?
अभी तक की रिसर्च से यह बात पूरी तरह साबित हो चुकी है कि सीलिएक बीमारी जेनेटिकल है यानी माता-पिता से मिले जींस से होती है।

क्या ग्लूटन इंटॉलरेंस भी जेनेटिकल है?
बिलकुल नहीं, ग्लूटन के प्रति इंटॉलरेंस जेनेटिकल नहीं है। यह किसी को भी किसी भी उम्र में हो सकता है।

क्या नॉन-सीलिएक में भी Leaky Gut देखा गया है?
विदेशों में सीलिएक और वीट इंटॉलरंस पर काफी रिसर्च हो रही हैं। कुछ वर्ष पहले तक यह माना जाता था कि Leaky Gut की समस्या सिर्फ सीलिएक रोगियों को ही हो सकती है जबकि विदेशों में कुछ मामले ऐसे आए हैं जहां नॉन-सीलिएक मरीजों को भी यह समस्या हुई है।

1. tTG-IgA एंटीबॉडी: सामान्य भाषा में इसे tTG भी कहा जाता है। इसे टिशू ट्रांसग्लूटामिनेज एंटीबॉडी टेस्ट भी कहते हैं। यह सीलिएक बीमारी का बेहतरीन टेस्ट है। इस टेस्ट के लिए अमूमन भूखे पेट या किसी खास हालत में जाने की जरूरत नहीं होती है। इसमें ब्लड का सैंपल लिया जाता है। इससे पता चलता है कि सीलिएक की समस्या हो सकती है। अगर इस टेस्ट का रिजल्ट पॉजिटिव आया है तो आंतों की स्थिति दूरबीन से देखनी पड़ेगी, जिसे एंडोस्कोपी ऑफ टिशू टेस्टिंग कहते हैं।
खर्च: 1000-1500 रुपये, रिपोर्ट: 24 घंटे में

2. एंडोस्कोपी बयॉप्सी या टिशू टेस्टिंग: इस टेस्ट में आंत से टिशू का एक बहुत छोटा-सा हिस्सा एंडोस्कोपी के दौरान निकाला जाता है।
खर्च: 5 से 12 हजार रुपये, रिपोर्ट: 2 से 3 दिनों में

टेस्ट के ऑप्शंस क्या हैं?
3. HLA DQ2 & DQ8: यह टेस्ट बताता है कि उस परिवार में किसी दूसरे शख्स को सीलिएक होने की आशंका तो नहीं है। अगर यह दोनों नेगेटिव हैं तो सीलिएक होने की आशंका न के बराबर है। इसमें श्ख्स के शरीर से ब्लड सैंपल लेकर जीन की टेस्टिंग की जाती है।
खर्च: 3 से 7 हजार रुपये
रिपोर्ट: 5-7 दिनों

4. फूड इंटॉलरेंस टेस्ट : इसे फूड पैनल 1/2/3 भी कहते हैं।
एक पैनल में अमूमन 10 तरह के फूड आइटम्स शामिल होते हैं। यह टेस्ट भी ब्लड से किया जाता है।
खर्च: 6000-8000 रुपये, रिपोर्ट: 3 से 4 दिनों में।

क्या ग्लूटन की वजह से सभी लोगों को गेहूं खाना छोड़ देना चाहिए?
जी नहीं। ऐसा बिलकुल नहीं है, लेकिन सभी लोग, ऐसे लोग जो बीमारी से पीड़ित नहीं हैं, उन्हें गेहूं तो खाते रहना चाहिए, लेकिन साथ-साथ दूसरे अनाजों को भी अपनी डाइट में शामिल जरूर करना चाहिए।

वीट बेली क्या है?
तमाम एहतियात बरतने के बावजूद कुछ लोगों को तोंद निकल आती है। उन्हें समझ नहीं आता कि ज्यादा न खाने के बावजूद उनके साथ ऐसा क्यों हो रहा है। हो सकता है कि उन्हें वीट बेली (Wheat Belley) हो। वीट बेली की समस्या ऐसे लोगों को होती है जिन्हें गेहूं से एलर्जी हो। इसकी वजह से उन्हें अपच, दस्त, पेट फूलना, स्किन से जुड़ी समस्या हो सकती है। इसके अलावा उन्हें खाने के बाद कमजोरी लगती है और बहुत ज्यादा सुस्ती आती है।

अनाज का रोटेशन करना जरूरी है?
89 फीसदी लोग जिन्हें ग्लूटन से जुड़ी कोई समस्या नहीं है, उन्हें गेहूं नहीं छोड़ना चाहिए, लेकिन यह जरूरी है कि वे गेहूं का आटा लगातार नहीं बल्कि एक अंतराल में खाएं। सीधे कहें तो सिर्फ गेहूं की रोटी ही नहीं बल्कि ज्वार, बाजरा, चावल, मकई आदि के आटे से बनी रोटी भी इन्हें खाना चाहिए। इससे ग्लूटन संबंधी अगर कोई समस्या भविष्य में होनी है तो उससे भी निजात मिल जाएगी। वैसे, शास्त्रों में कहा गया है कि एक साल यानी 365 दिन में 80 दिन गेहूं नहीं खाना चाहिए।

सीलिएक का पता कैसे चलता है?
किसी को सीलिएक बीमारी है कि नहीं, इसका पता लगाने के लिए एंडोस्कोपी का सहारा लिया जाता है। इसमें यह देखा जाता है कि आंत का टिशू खराब तो नहीं हुआ है। दरअसल, टिशू खराब होने के बाद इंसान की आंत के निचले हिस्से में छोटे-छोटे छेद हो जाते है, इसलिए इसे Leaky Gut भी कहा जाता है। ये छेद इतने छोटे होते हैं कि आसानी से इनका पता भी नहीं चलता। इसके अलावा इसके मरीजों का फूड या वीट इंटॉलरेंस टेस्ट भी होता है।

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प्रतीकात्मक चित्र

पुराने जमाने में यह बीमारी क्यों नहीं होती थी? क्या लोग गेहूं कम खाते थे?
वे गेहूं कम नहीं खाते थे, लेकिन जरूरत से ज्यादा भी नहीं खाते थे। वे फूड रोटेशन को फॉलो करते थे। गेहूं के अलावा बाजरा, ज्वार, चना आदि भी वे खूब खाते थे। वे शारीरिक मेहनत भी भरपूर करते थे। वहीं एक बड़ा अंतर यह भी था कि आज जितने तरह के रसायनिक खाद और पेस्टिसाइड का उपयोग होता है, वैसा पहले नहीं होता था।

क्या ग्लूटन वाले अनाज पूरी तरह बंद करने के बजाय लो-ग्लूटन खाना ठीक है?
कुछ महीने पहले तक लो-ग्लूटन यानी कम ग्लूटन वाले फूड प्रोडक्ट को FSSAI (फूड सेफ्ट एंड स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया) ने मान्यता दी थी, लेकिन अब लो-ग्लूटन वाले प्रॉडक्ट की मान्यता पूरी तरह खत्म कर दी है। अब या तो फूड प्रॉडक्ट ग्लूटन-फ्री होगा या फिर ग्लूटनयुक्त। ग्लूटन इंटॉलरंस या सीलिएक रोग के मामले में ग्लूटन-फ्री खाना ही ठीक रहेगा।

क्या ग्लूटन-फ्री फूड आसानी से उपलब्ध हैं?
पश्चिमी देशों में ग्लूटन सेंसिटिविटी को डायबीटीज जितना खतरनाक माना जाने लगा है। अमेरिका और यूरोप के कई देशों के रेस्तरां ग्लूटन-फ्री फूड को अपने मेन्यू में शामिल कर रहे हैं। भारत में ऐसे फूड के लिए खुद ही ज्यादा सजग रहने की जरूरत है। अभी देश में ऐसे रेस्तरां बहुत कम हैं।

मेडिकल फील्ड में इसकी चर्चा इतनी कम क्यों है?
यह मुमकिन है कि एक-तिहाई क्रोनिक बीमारी का कारण ग्लूटन हो, लेकिन अभी इस पर रिसर्च चल रही है। ग्लूटन और उससे जुड़ी समस्या के सभी लिंक जुड़ नहीं पाए हैं। इसलिए हम ग्लूटन को पूरी तरह जिम्मेदार भी नहीं मान सकते। यही कारण है कि मेडिकल फील्ड में इसकी चर्चा कम है।

ग्लूटन रहित खाना

ब्रेकफस्ट
(तीनों में से कोई एक)
धनिये की चटनी के साथ बेसन/ कुट्टू/ मूंग दाल का चीला
टमाटर की चटनी के साथ मूंग दाल वेजिटेबल इडली
राइस पोहा के साथ हरी सब्जी (लौकी, बिन्स आदि) और दही।

लंच से पहले
(दोनों में से कोई एक)
फल (सेब, संतरा, अमरूद आदि) और नारियल पानी
चना सत्तू (रोस्टेड चने का सत्तू), यह ध्यान रहे कि जौ का सत्तू नहीं क्योंकि इसमें ग्लूटन है।

लंच
रेड राइस/ सेला चावल/ ब्राउन राइस के साथ मूंग की दाल और हरी सब्जी (1 कटोरी)
बाजरा या ज्वार-मेथी रोटी- 1 से 2
मूंग दाल छिलका: 1 कटोरी (200 एमएल)
अपनी पसंद की सब्जी: 1 से 2 कटोरी (150 से 200 ग्राम)
सलाद (गाजर, मूली, टमाटर, खीरा आदि): 1 कटोरी (200 से 250 ग्राम)

शाम में
नट्स, चना भुना हुआ (50 से 75 ग्राम)
चना सत्तू (रोस्टेड चना का सत्तू)

डिनर

ज्वार या बाजरे का डोसा जिसमें हरी सब्जी, मूंगफली आदि हो।
मिक्स्ड मिलेट डोसा भी खा सकते हैं।

ग्लूटन के लिए हो जाएं सचेत
जिन्हें ग्लूटन सेंसिटिविटी की समस्या है, वे इसके लिए जरूर सचेत हों। ध्यान रहे कि यह स्थिति सभी के लिए नहीं है। गेहूं हमारी फूड हैबिट का अहम हिस्सा है। ऐसे में कोई भी कदम डॉक्टर की सलाह से ही लें। अगर सलाह यह मिलती है कि ग्लूटनयुक्त फूड नहीं खाना है तो इन्हें लिस्ट से बाहर कर सकते हैं। ग्लूटन आमतौर पर गेहूं, जौ, सूजी, माल्ट और बार्ली में मिलते हैं, लेकिन मिलावट की वजह से यह दूसरे भोज्य पदार्थों में भी मौजूद हो सकता है। ऐसे में खरीदारी करते समय प्रॉडक्ट के लेबल को देख लें कि उस पर ग्लूटन-फ्री लिखा हो। ग्लूटन युक्त पैक्ड फूड बहुतायत में मार्केट में उपलब्ध हैं। मसलन: पैक्ड सूप, मसाले, कैंडी, पास्ता आदि। इतना ही नहीं, लिपस्टिक में भी ग्लूटन मौजूद हो सकता है। इंडिया में अभी ऐसे प्रोडक्ट ज्यादा नहीं बन रहे हैं, लेकिन कुछ ऐसी कंपनियां हैं जो अब ऐसे प्रोडक्ट भी बना रही हैं और लेबल पर लिख भी रही हैं।

क्या ओट्स भी नहीं खा सकते?
ओट्स में ग्लूटन नहीं होता, लेकिन ऐसी आशंका रहती है कि जिस तरह के वातावरण में इसे तैयार किया जाता है उससे ग्लूटन इसमें मिल सकता है। अगर आप ओट्स खाना ही चाहते हैं तो ऐसे प्रॉडक्ट लें, जिन पर ग्लूटन-फ्री लिखा हो।

गेहूं न खाए तो गेहूं में मिलने वाले पोषक तत्व कहां से मिलेंगे?
इसके लिए सबसे बेहतरीन विकल्प है रूटेड वेजिटेबल्स यानी ऐसी सब्जियां जो जमीन के अंदर होती हैं, मसलन गाजर, प्याज, मूली, शकरकंद आदि। इन्हें सलाद के रूप में खा सकते हैं।

अगर किसी को महसूस होता है कि उसे ग्लूटन से एलर्जी है तो वह गेहूं की जगह कई दूसरे अनाज ले सकता है।

एक कप गेहूं के आटे के लिए विकल्प (1 कप यानी 250 ग्राम लगभग)

इनमें से कोई एक चीज

कॉर्नमील (मक्का): एक कप
आलू: 3/4 कप
चावल: 3/4 कप
सोया: 3/4 कप
साबूदाना: 3/4 कप

वहीं दूसरी चीजों में ऐसे तमाम आइटम उपलब्ध हैं, जिनमें ग्लूटन मौजूद नहीं है:
फल
सब्जियां, दाल, बीन्स
मांस, मछली, चिकन और अंडे
सामान्य डेयरी प्रोडक्ट्स (दूध, घी, मक्खन, क्रीम, दही)
ग्लूटन-फ्री अनाज: ब्राउन राइस, क्विनोआ, बाजरा, साबूदाना आदि।
सूखे मेवे
ऑलिव ऑयल, कोकोनट ऑयल, वेजिटेबल एंड सीड्स ऑयल्स, सनफ्लार ऑयल
चाय, कॉफी
ज्यादातर मसाले भी ग्लूटन-फ्री होते हैं।

नोट: विदेशों में खेतों से लेकर पैकिंग सभी चीजों में उच्च मानदंडों का पालन किया जाता है, इसलिए वहां पर ग्लूटन की मिलावट का खतरा कम रहता है। अपने देश में कुछ कंपनी ऐसे मानदंडों का पालन जरूर कर रही हैं, लेकिन अभी प्रोसेसिंग या पैकिंग आदि के दौरान ग्लूटन कंटेमिनेशन का खतरा जरूर रहता है।

भारत में लोग सदियों से गेहूं खा रहे हैं, लेकिन समस्या नहीं हुई। अब क्यों हो रही है?
यह सच है कि गेहूं हम हजारों बरसों से खाते आ रहे हैं, लेकिन अब चूंकि इस क्षेत्र में काफी रिसर्च हो रही हैं, इसलिए ग्लूटन से जुड़ी समस्याओं का पता चल रहा है। अब तक जो रिसर्च सामने आई है, उसके मुताबिक अल्सर, ऑस्टियोपोरोसिस, गठिया आदि का कारण गेहूं हो सकता है। सचाई तो यही है कि 25 से 30 साल पहले तक इसे विदेशी बीमारी ही मानी जाती थी। इसलिए देश में पहले इस पर रिसर्च भी नहीं हुई।

अगर किसी को गैस, पेटदर्द, अपच आदि की समस्या है तो उसे वीट एलर्जी या इससे जुड़े दूसरे टेस्ट करवाने की जरूरत है?


अगर समस्या ज्यादा गंभीर है तो जांच जरूर करवाएं। समस्या कम है तो एक बार उसे ग्लूटन वाले फूड आइटम्स को बंद करके देखना चाहिए।

गेहूं के बुरे असर को समझने के लिए कितने दिनों तक ग्लूटनयुक्त खाना बंद करना चाहिए?

ऐसे में 3 हफ्ते से 3 महीने या फिर सालभर तक ग्लूटनयुक्त खाना जरूर बंद करें। फर्क जल्द ही दिखने लग सकता है।

क्या बच्चों को भी यह समस्या हो सकती है?
अगर 6 महीने का बच्चा है और उसे ग्लूटन से एलर्जी है तो उसे गेहूं से बनी चीजें नहीं देनी चाहिए।

अगर ग्लूटन से एलर्जी है, लेकिन मरीज ग्लूटनवाला फूड लेता रहे तो क्या होगा?

उसकी आंतें कमजोर हो जाएंगी। पेट की समस्या हमेशा रहेगी। स्किन से जुड़ी समस्या हो सकती है। लगातार सिर में दर्द रह सकता है। हड्डियां भी कमजोर हो सकती हैं। इनके अलावा, खून की कमी भी हो सकती है।

कितना ग्लूटन लेना खतरनाक है?
अगर किसी को सीलिएक बीमारी है तो एक नाखून के 8वें भाग के बराबर ग्लूटन भी उसके लिए समस्या खड़ी कर सकता है।

केस स्टडी 1
वजन करीब 40 किलो। आंखें धंसी हुईं, शरीर हड्डियों का ढांचा... अब से 8 साल पहले संदीप (बदला हुआ नाम) को लोग इसी रूप में याद करते थे। डॉक्टरों ने सभी तरह के टेस्ट कर लिए, लेकिन बीमारी पकड़ में नहीं आई। शरीर में ऐंठन और अकड़न की शिकायत हमेशा बनी रहती थी। उनका चलना-फिरना मुश्किल हो गया था। जब उन्होंने एक डॉक्टर से दिखाया तो डॉक्टर ने उन्हें रात में खूब गेहूं से बना खाना खाकर अगले दिन सुबह जांच के लिए आने को कहा। जब उनकी जांच की गई तो पता चला कि संदीप को सीलिएक बीमारी है। डॉक्टर ने उन्हें गेहूं और गेहूं से बनी चीजों का सेवन बंद करने को कहा, यानी रोटी, पास्ता, पिज्जा, समोसा जैसी चीजें बंद। ऐसे में संदीप ने चावल और दक्षिण भारतीय खाना खाया क्योंकि इसमें गेहूं का कम ही उपयोग होता है। हालांकि इनमें उपमा शामिल नहीं था क्योंकि यह सूजी से बनता है। अब संदीप ठीक हैं और उनका वजन भी सही हो गया है।

केस स्टडी 2
एक बच्ची 7 साल की है। बचपन में उसे नींद नहीं आती थी। जैसे-जैसे वह बड़ी होने लगी, उसके लिए दिन में सोना बहुत जरूरी हो गया। अगर वह दिन में नहीं सोती थी तो शाम में उसके लिए कुछ भी करना मुश्किल हो जाता था। पैरंट्स ने डॉक्टर से दिखाया तो पता चला कि उसे गंभीर अनीमिया है। डॉक्टर ने अनीमिया की दवाई दी। तमाम उपाय कर लिए गए, लेकिन नतीजा सिफर रहा। वह ठीक नहीं हुई। इसी बीच एक दिन उसके पैरंट्स को गूगल करते हुए सीलिएक के बारे में पता चला। पैरंट्स उसे सीलिएक स्पेशलिस्ट डॉक्टर के पास ले गए। उन्होंने एंडोस्कोपी करने के बाद बताया कि बेटी को सीलिएक है। डॉक्टर की सुझाव के बाद गेहूं और ग्लूटन वाली चीजें उसे देना बंद कर दीं। हालांकि बच्चों के लिए ऐसे प्रोडक्ट को बंद करना मुश्किल होता है, लेकिन मजबूरी थी इसलिए करना पड़ा। आज वह बच्ची बिलकुल फिट है।

भारत में कितने सीलिएक मरीज?
भारत में गेहूं की वजह से पैदा हुई बीमारी (सीलिएक) से प्रभावित लोग एक अनुमान के अनुसार 1 फीसदी यानी 1,00,00,000
ऐसे लोगों को गेहूं समेत तमाम ऐसे फूड जिनमें ग्लूटन हो, लेना बंद कर देना चाहिए।

देश में वीट इंटॉलरंस कितनी?
10% लोग भारत में ऐसे हैं, जिन्हें नॉन-सीलिएक ग्लूटन सेंसिटिव है। यह एक अनुमान है। अभी ऐसा कोई डेटा देश में जारी नहीं हुआ है।

क्या सभी को गेहूं छोड़ना चाहिए?

89% बाकी बचे लोग जिन्हें ग्लूटन से कोई समस्या नहीं है, उन्हें गेहूं नहीं छोड़ना चाहिए, पर दूसरे अनाज भी खाने चाहिए।

एक्सपर्ट्स पैनल
डॉ. के. के. अग्रवाल
सीनियर कार्डियॉलजिस्ट

इशी खोसला
न्यूट्रिशनिस्ट एंड सीलिएक डाइट एक्सपर्ट

डॉ. टॉम ओ-ब्रायन
फंक्शनल मेडिसिन एक्सपर्ट, USA

प्रफेसर रॉडनी फोर्ड
फूड एलर्जी रिसर्चर, न्यूजीलैंड

डॉ. कैमिली लियनर्स
स्पेशलिस्ट फूड इन्टॉलरेंस, जर्मनी

डॉ. शरत गोपालन
कंसल्टेंट गेस्ट्रो,
रेनबो चिल्ड्रन हॉस्पिटल

डॉ. नीलम मोहन
कंसल्टेंट गेस्ट्रो,
मेदांता मेडिसिटी

मैरजी ओ-ब्रायन
न्यूट्रिशनल थेरपिस्ट, USA

डॉ. शिखा शर्मा
न्यूट्री-डाइट
एक्सपर्ट

वीना कात्याल
फूड कंसल्टेंट एंड रेसपी डिवेलपर

पाठकों से: अगर आपके पास भी सीलिएक या वीट इंटॉलरंस से जुड़ा हुआ कोई सवाल है तो हमें मंगलवार तक sundaynbt@gmail पर भेजें। सब्जेक्ट में glu लिखें। आप हमें 89298-16941 पर वॉट्सऐप भी कर सकते हैं। चुनिंदा सवाल को हम अपने पेज पर जगह देंगे।
Web Title gluten is harmful for your health know harmful effects symptoms and treatment in celiac and non celiac patients(News in Hindi from Navbharat Times , TIL Network)
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